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जागरूक एवं नैतिक सहभागिता के लिए मतदाता शिक्षा 

source e-Madhesh २०८२ फाल्गुन १ गते , शुक्रबार
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जागरूक एवं नैतिक सहभागिता के लिए मतदाता शिक्षा 


विनोदकुमार विमल,
 क्‍या मतदान करना केवल एक अधिकार, कर्तव्‍य, स्वैच्छिक  कार्रवाई है या बड़ी संख्‍या में लोगों द्वारा न केवल अभ्‍यर्थी के बल्कि अपने स्‍वयं के भाग्‍य का निर्णय करने के लिए की जाने वाली समर्थकारी सामूहिक यात्रा है ? मतदाता किसे मत देने  का निर्णय लेता है, यह उनकी अपनी व्‍यक्तिगत इच्‍छा और निर्णय होता है,  परंतु मतदाता को अवश्‍य और नि‍श्‍चय ही निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेना चाहिए । क्‍या हम मतदाता को ऐसा करने के लिए सशक्‍त, जागरूक, प्रेरित कर सकते हैं ? क्‍या हम उनके तर्कों एवं धारणाओं, विश्‍वासों एवं प्रेरणाओं, अवरोधों एवं चु‍नौतियों, अनुभवों  एवं उनकी उन आदतों, प्रसंगो एवं रूप रेखाओं को समझ सकते हैं जो मतदान करने और मतदान न करने के उनके निर्णय को आकार देता है ?  क्‍या हम मतदाता को इस बात की शक्ति की अनुभूति करने, उस शक्ति को महसूस करने, उस शक्ति में विश्‍वास करने के लिए प्रेरित कर सकते है और उसे यह फैसला करने के लिए उत्‍प्रेरित कर सकते हैं कि उनका एक वोट कितना बदलाव ला सकता है और यह भी की उनका एक वोट बदलाव लाता भी है ?  विविधता, भूगोल, सामाजिक – सांस्‍कृतिक – आस्‍थाकारकों, परिवार – समुदाय समीकरणों, लैंगिक पूर्वाग्रह, निशक्तता और कभी – कभी केवल उदासीनता, लापरवाही तथा आलस्‍यता की आदत मात्र से यह एक बड़ी भारी चुनौती है । मतदान करना केवल एक शारीरिक क्रिया भर नहीं है, यह प्रबंधन या सम्‍भार तंत्र का एक विषय मात्र नहीं है, यह केवल एक विषय या अधिकार या कर्तव्‍य नहीं है बल्कि ’ किसी एक व्‍यक्ति की शक्ति को प्रयोग में लाना है ।’
लोकतांत्रिक और निर्वाचनीय प्रक्रियाओं में मतदाताओं की सहभागिता किसी भी लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए अनिवार्य है और यह स्‍वस्‍थ लोकतांत्रिक निर्वाचनों का मूल आधार है ।  इस प्रकार  यह निर्वाचन प्रबंधन का एक अनिवार्य भाग बन जाता है । मतदाता शिक्षा किसी भी चुनाव के लिए मतदान प्रक्रिया की बारीकियों और मतदान के तरीकों और प्रक्रियाओं के बारे में मतदाताओं को सूचित करने के लिए सूचना सामग्री और कार्यक्रमों के प्रसार का कार्य है । इसे चुनाव संबंधी मतदाता जागरूकता कार्य के रूप में भी जाना जाता है । इसका उद्देश्य मतदाताओं को चुनाव प्रक्रिया, चुनावी प्रणाली, मतदान विधियों, उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों आदि के बारे में जानकारी देना है ।
मतदान के संबंध में आवश्यक शिक्षा या जानकारी प्राप्त करना प्रत्येक मतदाता का मौलिक अधिकार है । इसे मानवाधिकारों के अभिन्न अंग के रूप में भी महत्त्वपूर्ण  माना जाता है । नागरिक  एवं राजनैतिक अधिकारों (१९६६) पर अंतरॉष्‍ट्रीय प्रसंविदा के अनुच्‍छेद २५ में ’ समावेशन’  को प्राथमिकता दी गयी है । जिसमें यह अनुबंधि‍त किया गया है कि प्रत्‍येक नागरिक को जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्‍य अभिमत, राष्‍ट्रीय या सामाजिक मूल, सम्‍पत्ति, जन्‍म या अन्‍य अवस्थिति पर आधारित भेदभाव के बिना और बिना अनुचित प्रतिबंधों के मतदान करने तथा निर्वाचित होने का अधिकार एवं अवसर प्रदान किया जाना चाहिए ।
नेपाल के संविधान २०१५ का अनुच्छेद १९ संचार के अधिकार सहित मौलिक अधिकारों का प्रावधान करता है और अनुच्छेद २७ सूचना के अधिकार का प्रावधान करता है । इसके अतिरिक्त  ‘ सूचना का अधिकार अधिनियम, २००८’ के प्रावधानों के अनुसार किसी भी विषय पर मतदाता शिक्षा या जानकारी प्राप्त करना सभी मतदाताओं का स्वाभाविक अधिकार है । निर्वाचनों में धन और बाहुबल का दुरूपयोग समान अवसर उपलब्‍ध कराने की भावना को तहस – नहस कर देते हैं । यह लोकतंत्र की भावना को बिगाड़  देता है । किसी प्रलोभन पर विचार किए बिना पूर्व सूचित विकल्‍प चुनने की दृष्टियों से ’गुणवत्तापूर्ण  निर्वाचकीय सहभागिता’  जीवंत लोकतन्‍त्र की आधा‍रशिला है ।
चुनाव आयोग चुनाव के दौरान मतदाता शिक्षा कार्यक्रम के लिए  करोड़ों रुपये आवंटित करता है । मतदाता शिक्षा पर इतना बड़ा बजट खर्च करने के बावजूद, हर चुनाव में बड़ी संख्या में अमान्य वोट दर्ज होते दिख रहे हैं । चुनाव प्रबंधन निकाय के रिकॉर्ड से पता चलता है कि सन्  २०१७ और सन्  २०२२ के बीच हुए चुनावों में सैकड़ों हजारों वोट, जो कुल डाले गए वोटों के औसतन ४ प्रतिशत से अधिक हैं, अमान्य थे । सन्  २०२२ के संघीय संसद और प्रांतीय चुनावों में, डाले गए कुल वोटों में से ५.०६ प्रतिशत वोट अमान्य थे । उस चुनाव के दौरान, अकेले मतदाता शिक्षा योजना पर ही २६०.३ मिलियन रुपये का बजट खर्च किया गया था । इसी तरह नेपाल के संविधान, २०१५ के लागू होने के बाद देश में हुए पहले दो संसदीय चुनावों पर नजर डालें तो ऐसा प्रतीत होता है कि चुनाव प्रक्रिया में जनता की भागीदारी २०१७ में ६९ प्रतिशत से घटकर  सन् २०२२ में ६१.५ प्रतिशत हो गई है । स्थानीय चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी ६४ प्रतिशत रही, जबकि २०१७ के स्थानीय चुनावों में यह ७२.५ प्रतिशत थी 
िमतदाता शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद, आयोग भी प्रभावी शिक्षा प्रदान करने में सक्षम नहीं हो पाया है । पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने आम मतदाताओं से संपर्क साधा है और चुनाव चिह्न  लगाए हैं, लेकिन वे मुहरें कैसे लगा सकते हैं ? उन्होंने अमान्यता के अर्थ आदि के विषय पर कोई शिक्षा प्रदान नहीं की या प्रदान करना नहीं चाहा । आयोग द्वारा जारी किए गए संदेशों ÷ सूचनात्मक सामग्रियों का भी कोई ठोस प्रभाव नहीं दिखा । सभी का ध्यान वोट मांगने पर केंद्रित था । पार्टी ने मतदान के मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया । यहां तक ​​कि यह आलोचना भी हो रही है कि राज्य, आयोग और पार्टी ने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक आने के लिए प्रेरित नहीं किया । इससे पता चलता है कि चुनाव ÷ मतदाता शिक्षा कमजोर है ।
मतदाताओं की जागरूकता, मतपत्र का आकार, भौगोलिक स्थान, मतदान कक्ष और आसपास का वातावरण मतपत्रों को अमान्य घोषित करने वाले कारक हैं । अंधेरे कमरे में मतदान कराने के बजाय मतदाताओं को बिना किसी भय के अधिक खुला स्थान दिया जाना चाहिए । मतदान करते समय लोगों के हाथ कांपने लगते हैं । चुनाव चिह्न  इतने अधिक होते हैं कि भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है । जल्दीबाजी में भी आप उलझन में पड़ सकते हैं । इसलिए यह पता लगाने के लिए एक अध्ययन किया जाना चाहिए कि पिछले चुनावों में कितने और कहाँ चुनाव चिह्न  अमान्य घोषित किए गए और किस आधार पर ऐसा हुआ ।
मतदान में भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकार और राजनीतिक दलों को जनता की चिंताओं को गंभीरता से दूर करने की आवश्यकता है ।  मतदाता  शिक्षा नागरिकों को अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते समय सोच – समझकर निर्णय लेने में भी सक्षम बनाती है । इसलिए जमीनी स्तर पर मतदाता शिक्षा के संचालन पर अतिरिक्त ध्यान देना आवश्यक है । किसी देश द्वारा अपनाई गई चुनाव प्रणाली और चुनाव में भाग लेने वाले राजनीतिक दलों की संख्या भी वोटों के अमान्य होने के लिए समान रूप से जिम्मेदार होती है ।
मतदाताओं को शिक्षित करना ही सफल चुनाव कराने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने का एकमात्र तरीका है । इसके लिए ऐसा वातावरण बनाना आवश्यक है,  जहां मतदाता अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझ सकें । व्यवहार में  मतदाता शिक्षा चुनावी प्रक्रिया से संबंधित बुनियादी ज्ञान प्रदान करने और चुनावों के बारे में जानकारीपूर्ण संदेशों का प्रसार करने का कार्य है । इससे आम तौर पर मतदाताओं की उम्र, उद्देश्य, चुनावी प्रक्रिया आदि से संबंधित विभिन्न पहलुओं के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने में मदद मिली है । मतदाता शिक्षा चुनावी प्रक्रिया की स्पष्ट और सटीक समझ प्रदान करने में मदद कर सकती है, जिसका उद्देश्य महिलाओं, युवाओं, आदिवासी लोगों, दलितों और अन्य विशिष्ट समूहों को चुनावों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना है ।
इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली को अपनाना अमान्य वोटों और कम मतदान की मौजूदा समस्या का एक स्थायी समाधान हो सकता है । संविधान सभा चुनावों के दौरान, कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में परीक्षण के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों  का उपयोग किया गया था । यह प्रयोग अमान्य वोटों की संख्या कम करने और मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने में सफल रहा । जब चुनाव में  इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन  का उपयोग किया जाता है, तो मतदाताओं को मतदान करने में ज्यादा समय भी नहीं लगता है । मतगणना में भी कम समय लगता है । इसलिए सरकार के लिए इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली को अपनाने पर विचार करना आवश्यक है ।
मतदाता शिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण  सामग्रियों में पोस्टर, बैनर, पर्चे और अन्य सामग्री या गतिविधियाँ शामिल हैं । आगामी मार्च ५ को होने वाले प्रतिनिधि सभा चुनावों के संदर्भ में आधुनिक तकनीक का अधिकतम उपयोग करके भी मतदाता जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं । यदि मतदाता फेसबुक, वाइबर, ट्विटर और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग कर सकें तो चुनाव और मतदान प्रक्रिया के बारे में जागरूकता अधिक प्रभावी ढंग से फैलाई जा सकती है । मतदाता जागरूकता कार्यक्रम नागरिक समाज और पर्यवेक्षकों जैसे कई समूहों को लक्षित करके आयोजित किए जाने चाहिए, क्योंकि सूचित मतदाताओं की भागीदारी चुनावों के शांतिपूर्ण प्रबंधन और जनता द्वारा उनके परिणामों की स्वीकृति में योगदान देती है ।
यह लेख मुख्य रूप से चुनाव आयोग की रिपोर्टों, विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों और स्तंभकार के स्वयं के शोध और अनुभव पर आधारित है ।

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