ई-मधेश न्युज
किसानके गुमान (मैथिली कविता)
किसानके गुमान (मैथिली कविता) रचना :- शुभाष झा
छि हम किसान, बुझैछि अपनाक महान ।
करैछि हम खेती खलिहान, पालैछि जहान ।।
भोरे भोर उठी हम, जाइछि खेत बारी ।
जोती कोडी कोदाइर पारी, घास पात सेहो उखारी ।।
साउन भादब रोपी धान, बुझै नाइछि बारिस घाम ।
कार्तिक अगहन बुनी गहुम, करैछि सालक इन्तजाम ।।
मोन लगाक करि बारी, रोपी ढेरो तिमन तरकारी ।
फरे लागि ज ढेरी ढाकी, अपनो खाई आ बेची उगारी ।।
नाई रहै हमर ललसा बडका, पहिरी सबदिन कपडा सादा ।
लुङ्गी गमछामे जीवन गुजारी, सुति चटाई बुझिक गद्दा ।।
छि हम बड् मिहिनेती, आराम नाई करि एको रति ।
चुल्हा चौका जन बोइन, सब करि मिल क पत्नी पति ।।
ककरो नाई सही कोनो दबाब, बुझैछि अपनाक नबाब ।
खेत अपन अपने जोतब, अपन करब अपने हिसाब ।।
धर्तीक छाति चिरी, बुनब अनेकोँ बिया बाइल ।
पसिना सँ ओकरा सिँची, बनाइब अपन सुन्दर काइल ।।
रह कतबु पढल लिखल, या ओ कर नोकरी सरकारी ।
हमरे उब्जाइल अन्न तिमन सँ, भरैय पेट मोडर्न नर नारी ।।
अपनाक कहबैमे किसान, होइय हमरा बड गुमान ।
हमही किसान सब मिलक, बनायब अपन देश महान ।।
// धन्यवाद //
रचना :- शुभाष झा