ई-मधेश न्युज
छठ: सामाजिक और सांस्कृतिक सद्भाव का महापर्व
विनोदकुमार विमल ’ गोल्ड मेडलिस्ट ’,
’’नेपाली समाज में धार्मिक पर्व केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक एकता के वाहक रहे हैं पर्वों के माध्यम से लोकजीवन न केवल ईश्वर से संवाद करता है, अपने समुदाय और पर्यावरण से भी संबंध बनाता है इन्हीं पर्वों में छठ सबसे विशिष्ट है, क्योंकि यह किसी विशिष्ट जाति, पंथ या सम्प्रदाय की सीमा में बंधा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का साझा संस्कार है ियह वह पर्व है जहाँ धर्म और समाज, व्यक्ति और समुदाय, आस्था और प्रकृति सभी एक साथ अनुभव में आते हैं िसूर्योपासना के इस उत्सव में जो तत्व सबसे अधिक प्रभावी है, वह है सामाजिक समन्वय’’ विनोदकुमार विमल काठमांडू २७ अक्टूबर, २०२५ नेपाल के अनेक जीवंत पर्वों में, छठ पूजा अपनी सादगी, आध्यात्मिक गहराई और गहन भक्ति के लिए एक विशिष्ट स्थान रखती है । मूर्ति पूजा वाले अन्य पर्वों के विपरीत, छठ पूजा सूर्य देव और उनकी पत्नी उषा (छठी मैया) को समर्पित है । छठ पूजा सबसे पर्यावरण– अनुकूल और आध्यात्मिक रूप से महत्त्वपूर्ण पर्वों में से एक है यह एक धन्यवाद उत्सव है जहाँ भक्त पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और स्वास्थ्य, समृद्धि और खुशी के लिए आशीर्वाद मांगते हैं । इसे और भी खास बनाता है भक्तों द्वारा रखा जाने वाला कठोर अनुशासन, पवित्रता और कठोर उपवास, अक्सर बिना अन्न या जल ग्रहण किए ।
छठ पूजा को सूर्य षष्ठी ,छठ पर्व डाला पूजा, डाला छठ और छठी के नाम से भी जाना जाता है । माना जाता है कि छठी माता की पूजा से सभी मनोकामना पूरी होती है । हिंदू धर्म में छठ पूजा के उपवास को सभी व्रतों में सबसे कठिन माना जाता है, क्योंकि यह लगभग ३६ घंटों तक रखने वाला निर्जला व्रत है । इस दौरान साफ–सफाई से लेकर पूजा–पाठ के कई नियमों का खास ध्यान रखा जाता है । चार दिन के इस महापर्व की शुरुआत नहाय–खाय से होती है और सूर्योदय अघ्र्य के साथ इसका समापन होता है । अधिकांश पर्वों में पूजा करवाने के लिए पंडित या पुरोहित की आवश्यकता होती है, लेकिन छठ पूजा इससे अलग है । इस पर्व में किसी विशेष मंत्र या विधि–विधान की जरूरत नहीं होती । छठ पूजा पूरी तरह श्रद्धा, आस्था और पवित्रता पर आधारित है । इसमें व्रती स्वयं ही पुरोहित और
यजमान बनकर पूजा करते हैं । नहाय–खाय से लेकर खरना, संध्या अघ्र्य और प्रातःकालीन अघ्र्य तक हर चरण में केवल लोक आस्था और भक्ति की भावना प्रमुख रहती है । यही सरलता और आत्मसमर्पण छठ पूजा को सबसे विशेष और पवित्र बनाते हैं ।
यह पर्व , जिसे सद्भाव और भाईचारे का प्रतीक भी माना जाता है, बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है, जिसमें घाटों, केले के स्तंभों और नदियों, झीलों या तालाबों के किनारे टिमटिमाती रोशनी को फूलों से सजाया जाता है और डूबते और उगते सूर्य दोनों की किरणों को अघ्र्य दिया जाता है । मानव सभ्यता के आरंभ से ही सूर्य की पूजा की जाती रही है । अग्नि पुराण में भी षष्ठी व्रत का उल्लेख है ।
महाभारत में कुंती और द्रौपदी सहित पांडवों द्वारा अपने चौदह वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान इस व्रत का पालन करने का वर्णन है । कहा जाता है कि त्रेता युग में राजा दशरथ की रानी कौशल्या ने भी यह व्रत रखा था । पूजा का एक अन्य महत्त्व भगवान राम की कहानी से भी जुड़ा हुआ है । प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, श्रीराम और सीता माता ने उपवास किया था और १४ साल के निर्वासन के बाद शुक्ल पक्ष में कार्तिक के महीने में सूर्य देव की अर्चना की थी । तब से, छठ पूजा एक महत्त्वपूर्ण और पारंपरिक हिंदू उत्सव बन गया, जिसे हर साल उत्साह से मनाया जाता है । नेपाल में छठ पूजा भक्ति, संस्कृति और समुदाय का एक असाधारण उत्सव है । यह एक ऐसा अवसर है जब परिवार सूर्य देव के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए एकत्रित होते हैं और स्वास्थ्य, धन और समृद्धि के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं । चाहे काठमांडू के घाट हों या तराई – मधेश के मनोरम स्थल, यह त्योहार धार्मिक उत्साह, सांस्कृतिक एकता और मानव और प्रकृति के बीच शाश्वत संबंध का जीवंत प्रदर्शन प्रस्तुत करता है । इस कड़ी में मधेश प्रदेश की राजधानी जनकपुर, छठ पूजा के भव्य उत्सव का साक्षी है । बड़े तालाब और आसपास के नदी तट छठ व्रतियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं । नेपाल के रौतहट जÞिले में भोजपुरी भाषी लोगों की एक बड़ी आबादी रहती है जो छठ पूजा बड़े उत्साह से मनाते हैं । इस क्षेत्र की नदियाँ, तालाब और खुले मैदान सूर्य को अघ्र्य देने वाले श्रद्धालुओं से भरे रहते हैं । नेपाल के पूर्वी तराई क्षेत्र में स्थित, लहान अपने बड़े
पैमाने पर छठ पूजा समारोहों के लिए जाना जाता है । इस आयोजन में आस–पास के शहरों से भी लोग आते हैं, जो इसे तराई – मधेश में छठ पूजा के मुख्य आकर्षणों में से एक बनाता है । नेपाल के पूर्वी तराई क्षेत्र के प्रमुख शहरों में से एक, विराटनगर, छठ पूजा मनाने वाले लोगों की एक बड़ी आबादी का घर है । इसी प्रकार, नेपाल के सुदूर पश्चिमी क्षेत्र में स्थित नेपालगंज अपने धार्मिक अनुष्ठानों के लिए जाना जाता है और छठ पूजा यहाँ के सबसे महत्त्वपूर्ण पर्वों में से एक है ।
यह पर्व , जो कभी तराई–मधेश के हिंदुओं द्वारा मनाया जाता था, हाल ही में हर क्षेत्र और समुदाय द्वारा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने लगा है । आजकल छठ महापर्व तराई – मधेश सहित पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है । यह पर्व काठमांडू घाटी में भी विशेष तरीके से मनाया जाता है ।
पिछले कुछ वर्षों से रानीपोखरी में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व वर्तमान में यहां पुनः संगठित किया जा रहा है, इसलिए इसे रानीपोखरी, कमलपोखरी, बागमती नदी के तट, गौरीघाट, बिष्णुमती के तट, भक्तपुर के हनुमन्ते नदी के तट और इसी प्रकार की अन्य तटों पर मनाया जाता है । काठमांडू मेट्रोपॉलिटन सिटी ने इस वर्ष छठ पर्व मनाने के लिए महानगर के भीतर आठ स्थानों को चिह्नित किया है ––– कमल पोखरी, गौरीदह, बोक्सिदह, बागमती दोभान, कुमारी क्लब के सामने बल्खू, कुलेश्वर वॉलीबॉल स्टेडियम और रामघाट ।
सामाजिक और सांस्कृतिक सद्भाव का महापर्व
छठ पर्व में कोई अनुष्ठान नहीं होता, इसलिए इसमें कोई पुजारी नहीं होता । जिस प्रकार माताएँ या शिशुओं के साथ रहने वाली महिलाएँ जन्म के बाद किसी भी संक्रमण से बचने के लिए स्वच्छता का पूरा ध्यान रखती हैं, उसी प्रकार छठ का अनुष्ठान भी होता है । इस पर्व में स्वच्छता को पवित्रता से जोड़ा जाता है और उसका पालन किया जाता है । नेपाल में पिछले कुछ वर्षों से मुस्लिम समुदाय के
लोग भी इस महापर्व की ओर आकर्षित हुए हैं । इस महापर्व के कारण विभिन्न
समुदायों, जातियों और धर्मों के लोगों के बीच सद्भाव बढ़ा है । विशेषज्ञों का कहना है कि छठ पर्व विभिन्न समुदायों के लोगों को एक साथ लाता है । इस महापर्व के दौरान, गरीब, अमीर और समुदाय के सभी लोग पूजा करने और इस महापर्व को मनाने के लिए एक साथ आते हैं । उनके अनुसार, छठ पर्व धार्मिक और सामाजिक एकता का महापर्व रहा है ।
छठ पूजा सामाजिक सद्भाव और एकता का प्रतीक है क्योंकि यह जाति, धर्म और आर्थिक स्थिति के भेदभाव को खत्म करती है, और सभी लोग एक साथ सूर्य और छठी मैया की पूजा करते हैं । घाट पर एक साथ अघ्र्य देने की परंपरा सभी को एक सूत्र में बांधती है अर्थात् जाति या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता है िइस दौरान, लोग घाटों की सफाई करने, प्रसाद तैयार करने और एक–दूसरे की मदद करने जैसे कार्यों में मिलकर भाग लेते हैं, जिससे सामुदायिक भावना मजबूत होती है । छठ पर्व का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि यह अंतरवर्गीय और अंतरजातीय एकता को मूर्त करता है । नदी, तालाब सभी के लिए समान रूप से खुला स्थान होता है । सभी जातियों और वर्गों के लोग एक ही घाट पर इकट्ठे होते हैं, एक ही जल में अघ्र्य देते हैं । यह दृश्य एक सामाजिक संदेश देता है — ’ जहाँ सूर्य सबका है, वहाँ समाज भी सबका है ।’ लोककवि भिखारी ठाकुर ने इस एकता की झलक अपने छठ गीतों में दी है —“सूरुज देव सब पर दिहलें उजियार, ना जात– पात के बंधन रह गइल संसार ।” यह गीत स्पष्ट करता है कि छठ पर्व जातीय विभाजनों के पार एक सामूहिक लोकमानवता की स्थापना करता है ।
अद्यतन में, तमाम आधुनिक विकृतियों और भौतिकवादी पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के बीच भी इस महापर्व की मूल आत्मा जिंदा है, जो घर से घाट तक दिखती रहती है िआज किसी भी घाट पर जाएँ, वहाँ समाज की मिल्लत का जो नजारा उभरता है, वह दुनिया की किसी भी संस्कृति में नहीं दिखता िन कोई राजा, न रंक ऊंच – नीच और जाति – धर्म का कोई भेद नहीं िसभी की हैसियत एक जैसी
निष्कर्ष
नेपाल में छठ पर्व इसलिए खfस है क्योंकि यह आध्यात्मिक महत्त्व, सांस्कृतिक
गहराई और पर्यावरण के साथ एक मजबूत जुड़ाव का अद्भुत संगम है । सूर्यदेव को समर्पित यह पर्व गहरी श्रद्धा और कृतज्ञता का संचार करता है । प्रकृति से जुड़ा यह उत्सव, पीढयों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करता है, जिससे यह नेपाल में एक अद्वितीय और आध्यात्मिक रूप से महत्त्वपूर्ण आयोजन बन जाता है । चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व न केवल एक आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है, बल्कि दैनिक जीवन में अनुशासन, आस्था और कृतज्ञता के महत्त्व को भी पुष्ट करता है । जब छठी माता के लिए विभिन्न भजन और कीर्तन गाए जाते हैं, जलाशय के चारों ओर गाड़े गए केले के स्तंभों को अघ्र्य दिया जाता है, तथा उगते और डूबते सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है, तो ऐसा महसूस होता है जैसे प्राचीन संस्कृति सदियों से प्रकृति और मानव के बीच गहरे अंतर्संबंधों को पुनर्परिभाषित कर रही है छठ पर्व आप सभी को सुख, शांति और समृद्धि का वातावरण बनाकर सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करे। अंत में, प्रकृति और सभ्यता की अनूठी मिसाल,लोकआस्था के महापर्व छठ के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ ।