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किसानके गुमान (मैथिली कविता)

source e-Madhesh २०८२ कार्तिक १७ गते , सोमबार
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किसानके गुमान (मैथिली कविता)

                           किसानके गुमान (मैथिली कविता)                                          रचना :- शुभाष झा 

 

छि हम किसान, बुझैछि अपनाक महान ।

करैछि हम खेती खलिहान, पालैछि जहान ।।

 

भोरे भोर उठी हम, जाइछि खेत बारी ।

जोती कोडी कोदाइर पारी, घास पात सेहो उखारी ।।

 

साउन भादब रोपी धान, बुझै नाइछि बारिस घाम ।

कार्तिक अगहन बुनी गहुम, करैछि सालक इन्तजाम ।।

 

मोन लगाक करि बारी, रोपी ढेरो तिमन तरकारी ।

फरे लागि ज ढेरी ढाकी, अपनो खाई आ बेची उगारी ।।

 

नाई रहै हमर ललसा बडका, पहिरी सबदिन कपडा सादा ।

लुङ्गी गमछामे जीवन गुजारी, सुति चटाई बुझिक गद्दा ।।

 

छि हम बड् मिहिनेती, आराम नाई करि एको रति ।

चुल्हा चौका जन बोइन, सब करि मिल क पत्नी पति ।।

 

ककरो नाई सही कोनो दबाब, बुझैछि अपनाक नबाब ।

खेत अपन अपने जोतब, अपन करब अपने हिसाब ।।

 

धर्तीक छाति चिरी, बुनब अनेकोँ बिया बाइल ।

पसिना सँ ओकरा सिँची, बनाइब अपन सुन्दर काइल ।।

 

रह कतबु पढल लिखल, या ओ कर नोकरी सरकारी ।

हमरे उब्जाइल अन्न तिमन सँ, भरैय पेट मोडर्न नर नारी ।।

 

अपनाक कहबैमे किसान, होइय हमरा बड गुमान ।

हमही किसान सब मिलक, बनायब अपन देश महान ।।

//  धन्यवाद //

 

                   रचना :- शुभाष झा 

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